छत्तीसगढ़ सरगुजा

वायरल बनाम विश्वसनीय: आज भी अख़बार क्यों ज़रूरी है, डिजिटल की रफ्तार में कहीं खो न जाए स्याही की सच्चाई...!

Posted on Jan 18, 2026 02:43 PM

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वायरल बनाम विश्वसनीय: आज भी अख़बार क्यों ज़रूरी है, डिजिटल की रफ्तार में कहीं खो न जाए स्याही की सच्चाई...!

आदित्य कुमार 


अम्बिकापुर - प्रिंट मीडिया की कलम बनाम डिजिटल स्क्रीन डिजिटल दौर में भी अख़बार की स्याही क्यों ज़रूरी हैआज का समय मोबाइल स्क्रीन केउजाले में डूबा हुआ है। हर हाथ में स्मार्टफोन है और हर आवाज़ के साथ यह दावा भी “अब डिजिटल का ज़माना है।” लेकिन इस शोर के बीच एकसवाल अनसुना रह जाता है क्या डिजिटल की तेज़ रफ्तार में पत्रकारिता की गहराई सुरक्षित हैप्रिंट मीडिया सिर्फ़ खबर नहीं देतावह समझ देता है।अख़बार का एक-एक पन्ना मेहनतशोध और ज़मीनी सच्चाई का परिणाम होता है। जब पाठक अख़बार के पन्ने पलटता हैतो वह शब्दों के पीछेछिपी गंभीरतासंदर्भ और जिम्मेदारी को महसूस करता है। यह अनुभव मोबाइल स्क्रीन के ब्लिंक करते नोटिफिकेशन नहीं दे सकते। आज सोशलमीडिया ने हर व्यक्ति को “तुरंत रिपोर्टर” बना दिया है। एक तस्वीरएक लाइन और वायरल होने की होड़ लेकिन क्या यही पत्रकारिता हैप्रिंटमीडिया में खबर लिखना सिर्फ़ सूचना देना नहींबल्कि पूरी कहानीउसका सामाजिक असर और सच्चाई सामने लाना होता है। यहां “स्वाइप” नहींसत्य की खोज होती है।

पर्यावरण का तर्क भी अक्सर अधूरा पेश किया जाता है। कागज बचाने की बात तो होती हैलेकिन यह नहीं बताया जाता कि हर लाइकहर शेयरऔर हर वीडियो देखने के पीछे विशाल डिजिटल सर्वर ऊर्जा खपत करते हैं। सवाल यह नहीं कि कागज बेहतर है या डिजिटल सवाल यह है किजिम्मेदार माध्यम कौन-सा है।

यह सच है कि डिजिटल मीडिया ने सूचनाओं को तेज़ और सुलभ बनाया हैलेकिन तेज़ी ही सब कुछ नहीं होती। अख़बार आज भी वह दस्तावेज़ हैजोइतिहास के पन्नों में दर्ज रहता है। वायरल खबरें कल भूल जाती हैंलेकिन प्रिंट में छपी सच्ची रिपोर्ट समय की गवाही बनती है। प्रिंट मीडिया कीकलम आज भी वही कहती है खबर सनसनी नहींसच्चाई होनी चाहिए। डिजिटल और प्रिंट एक-दूसरे के विरोधी नहींलेकिन जब बात भरोसेगहराईऔर इतिहास की हो तो अख़बार की स्याही आज भी सबसे मजबूत आवाज़ है।

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